
देहरादून। उत्तराखंड की गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी और नेपाली भाषाओं में केवल संवाद ही नहीं, बल्कि देवत्व और पहाड़ की आत्मा भी बसती है। प्रदेश की लोक संस्कृति, गीत-संगीत, जागर और परंपराएं प्रकृति तथा इष्टदेवों से गहराई से जुड़ी हैं। इन्हें संरक्षित कर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। यह बात महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने ‘आवाज सुनो पहाड़ों की’ मंच की ओर से आयोजित श्रद्धा सम्मान लोकपितृ स्मरण समारोह-2026 में कही।
श्रद्धा सम्मान लोकपितृ स्मरण समारोह में दिवंगत लोक कलाकारों के परिजनों का सम्मान, लोक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर जोर
समारोह के तीसरे दिन भगत सिंह कोश्यारी ने लोकपितृ की स्मृति में दीप प्रज्ज्वलित कर दिवंगत लोक कलाकारों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि कला ईश्वर की देन है और उत्तराखंड को प्रकृति ने जागर, लोकगीत और समृद्ध गीत-संगीत की परंपरा प्रदान की है। अनेक लोक कलाकारों और साहित्यकारों ने अपना पूरा जीवन पहाड़ की संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने में समर्पित किया। उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार नदियों का उद्गम पर्वतों से होता है, उसी प्रकार संस्कृति की अनेक धाराएं भी पर्वतीय क्षेत्रों से निकलती हैं। उत्तराखंड भगवान शिव और मां नंदा की भूमि है। ऐसे में अपनी लोक परंपराओं, भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का दायित्व समाज के प्रत्येक व्यक्ति का है।
भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए समाज की भागीदारी जरूरी
कोश्यारी ने अपने सांसद कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि दिल्ली में गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा सिखाने की पहल की गई थी, जो आज भी जारी है। उन्होंने कहा कि भाषा और संस्कृति का संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है, इसके लिए समाज की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि सरकार उत्तराखंड की संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए लगातार प्रयास कर रही है। आर्थिक और भौतिक विकास के साथ सांस्कृतिक विकास को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने रिवर्स माइग्रेशन को पहाड़ के भविष्य से जोड़ते हुए कहा कि गांवों को मजबूत बनाकर ही लोगों को अपनी जड़ों और संस्कृति से जोड़ा जा सकता है।
दिवंगत कलाकारों के सम्मान की जिम्मेदारी सरकार उठाए : नरेंद्र रौथाण
कार्यक्रम संयोजक नरेंद्र रौथाण ने कहा कि दिवंगत लोक कलाकारों के सम्मान में इस प्रकार के कार्यक्रम सरकार की ओर से भी आयोजित किए जाने चाहिए। उन्होंने भगत सिंह कोश्यारी से इस दिशा में पहल करने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा कि कलाकारों को केवल बड़े मंचों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि गांव, ब्लॉक और जिला स्तर पर भी उन्हें सम्मान और पहचान मिलनी चाहिए। उन्होंने फिल्म नीति में ब्लॉक स्तर पर कलाकारों के इंटरव्यू और चयन की व्यवस्था किए जाने की मांग की, ताकि गांवों में छिपी प्रतिभाओं को आगे आने का अवसर मिल सके।
लोक संस्कृति को गांवों और आम लोगों से जोड़ना जरूरी
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता एवं विशिष्ट अतिथि संजय शर्मा दरमोड़ा ने कहा कि पितृ पक्ष में दिवंगत लोक कलाकारों को श्रद्धांजलि अर्पित करना सराहनीय पहल है। उन्होंने कार्यक्रम में शामिल होकर लोक कलाकारों के योगदान को सम्मान देने के लिए भगत सिंह कोश्यारी का आभार जताया।
उन्होंने कहा कि ‘आवाज सुनो पहाड़ों की’ मंच ने लोक संस्कृति के साथ-साथ गांव की सामान्य महिलाओं और कलाकारों को भी मंच उपलब्ध कराया है। घास काटने वाली महिला को मंच देकर उसकी आवाज देश-विदेश तक पहुंचाने का प्रयास लोक संस्कृति और ग्रामीण प्रतिभाओं के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
लोक संस्कृति के लिए स्थायी मंच और ठोस नीति जरूरी : गणेश गोदियाल
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति और लोक कलाकार प्रदेश की पहचान हैं। गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी सहित स्थानीय भाषाओं एवं लोक परंपराओं को केवल आयोजनों तक सीमित रखने के बजाय इनके संरक्षण के लिए ठोस और स्थायी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि दिवंगत कलाकारों के योगदान को याद करना सराहनीय पहल है। गांव और ब्लॉक स्तर पर कलाकारों को मंच, आर्थिक सहयोग और सम्मान देने की नीति बननी चाहिए, जिससे नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रह सके।
लोक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए सरकार गंभीर : दीप्ति रावत भारद्वाज
भाजपा प्रदेश महामंत्री दीप्ति रावत भारद्वाज ने कहा कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, भाषा, गीत-संगीत और परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर सरकार गंभीरता से कार्य कर रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सांस्कृतिक विरासत को पर्यटन और रोजगार से जोड़ने के साथ ही स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि दिवंगत लोक कलाकारों को श्रद्धांजलि देना और उनके परिजनों का सम्मान करना प्रदेश की सांस्कृतिक स्मृति को मजबूत करता है। ऐसे आयोजन युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों और लोक परंपराओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लोक परंपराओं की जड़ों को गांवों में मजबूत करने पर जोर
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि ढोल सागर, मांगल गीत और उत्तराखंड की विभिन्न लोक परंपराओं की जड़ें गांवों में हैं। इसलिए लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए गांवों और स्थानीय कलाकारों को केंद्र में रखना आवश्यक है। इस अवसर पर शकुंतला इष्टवाल और अनुसुईया प्रसाद उनियाल सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
दिवंगत लोक कलाकारों के परिजनों का सम्मान
समारोह में विभिन्न विधाओं से जुड़े दिवंगत लोक कलाकारों के परिजनों को सम्मानित किया गया। गीत-संगीत के क्षेत्र में दीवान कनवाल के पुत्र कमलेश कनवाल, गुंजन डंगवाल के पिता कैलाश डंगवाल, भगवती प्रसाद पोखरियाल की पत्नी सत्या पोखरियाल एवं पुत्र संजय पोखरियाल तथा पंडित केशव राम की पत्नी और भाई को सम्मान प्रदान किया गया।
फिल्म एवं नाट्य क्षेत्र में गीता उनियाल के पति विकास उनियाल और जयपाल नेगी की पत्नी कोमल राणा नेगी को सम्मानित किया गया। भाषा-साहित्य के क्षेत्र में चारू चंद्र चंदोला की पत्नी राजेश्वरी चंदोला और हरिदत्त भट्ट ‘शैलेश’ के पुत्र हिमांशु भट्ट को सम्मान मिला।
महिलाओं के विशेष योगदान के लिए कमलेश नेगी को तथा सूचना विभाग की ओर से सुरेश चंद्र भट्ट को भी सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम का संचालन सुनील सजवाण ने किया। कार्यक्रम संयोजक नरेंद्र रौथाण ने सभी अतिथियों, कलाकारों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।









