
मायावती आश्रम में स्वामी विवेकानंद की 164वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में प्रबुद्ध भारत के संपादक का ओजस्वी प्रवचन।
लोहाघाट। स्वामी विवेकानंद जैसे दिव्य, तेजस्वी और ओजस्वी व्यक्तित्व की प्राप्ति के लिए सनातन संस्कृति में षोडश संस्कारों (16 संस्कारों) का विशेष महत्व बताया गया है। यही संस्कारों की साधना का परिणाम था कि स्वामी विवेकानंद के माता-पिता को लंबी तपस्या और साधना के बाद नरेंद्रनाथ जैसे विलक्षण पुत्र की प्राप्ति हुई, जो आगे चलकर स्वामी विवेकानंद के नाम से पूरे विश्व में विख्यात हुए। यह विचार अध्यात्म भूमि मायावती आश्रम में स्वामी विवेकानंद की 164वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक पत्रिका ‘प्रबुद्ध भारत’ के विद्वान संपादक स्वामी दिव्य कृपानंद जी महाराज ने व्यक्त किए।
स्वामी दिव्य कृपानंद जी ने कहा कि आज से सवा सौ वर्ष पूर्व स्वयं स्वामी विवेकानंद के करकमलों द्वारा इस मायावती आश्रम की स्थापना की गई थी, जो आज भी उनकी विचारधारा और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत केंद्र है। उन्होंने कहा कि सांसारिक जीवन में हर माता-पिता की इच्छा होती है कि उनका पुत्र महान बने, लेकिन आज के समय में लोग सनातन संस्कृति के मूल्यों, आदर्शों और मान्यताओं से भटककर ऐसी पीढ़ी को जन्म दे रहे हैं जो न तो भारतीय संस्कृति से जुड़ पा रही है और न ही अपने भीतर प्राकृतिक और आध्यात्मिक ऊर्जा विकसित कर पा रही है।
उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद में अलौकिक ऊर्जा थी। वे किसी भी विचार या सिद्धांत को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं करते थे, बल्कि उसे कसौटी पर परखकर ही आत्मसात करते थे। हिंदू धर्म की व्यापकता और मानवीय दृष्टि का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जैसे वृक्षों पर लगे फल यह नहीं पूछते कि उन्हें कौन खाएगा, उसी प्रकार इंसानियत में भले ही भिन्नता हो, लेकिन मनुष्य सभी समान होते हैं—यही भाव स्वामी विवेकानंद के विचारों की मूल आत्मा थी। स्वामी दिव्य कृपानंद जी ने प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब श्री रामकृष्ण परमहंस ने पहली बार स्वामी विवेकानंद को देखा, तो उन्होंने कहा था— “तुम अब तक कहां थे? मैं तो तुम्हारी लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहा था।
” वहीं स्वामी विवेकानंद ने भी श्री रामकृष्ण के आचरण और व्यवहार में ऐसी आध्यात्मिक विद्युत शक्ति देखी कि उन्हें वही गुरु मिले जिनकी वे खोज कर रहे थे। कार्यक्रम में आश्रम प्रबंधक स्वामी सुहृदानंद, धर्मार्थ चिकित्सालय के प्रभारी स्वामी एकदेवानंद, स्वामी एकविदानंद ने उपस्थित श्रद्धालुओं को आशीर्वाद प्रदान किया। इस अवसर पर भंडारे का भी आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।कार्यक्रम में सिविल जज भवदीप सिंह रावते, पूर्व डीजीसी अमरनाथ वर्मा, डीजीसी भास्कर मुरारी, पूर्व वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी भगवत प्रसाद पांडे, शिक्षाविद नाथूराम राय, पीजी कॉलेज के सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रकाश लखेड़ा, कुलदीप राय, जगदीश सिंह अधिकारी, डॉ. मंजीत सिंह, मनीष जुकरिया, जनार्दन चिलकोटी, राजेंद्र गडकोटी, सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।





