
हिमालय की गोद में अद्वैत आश्रम मायावती बना आध्यात्मिक चेतना का केंद्र।
क्षेत्र के इतिहास में 3 जनवरी 1901 का दिन एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज है। इस दिन हिमालय की चोटियों पर बर्फ की श्वेत चादर बिछी थी, देवदार और बांज के वृक्ष हिमपात से आच्छादित थे और प्रकृति अपने अलौकिक सौंदर्य में मानो किसी महापुरुष के स्वागत को तत्पर थी। कड़ाके की ठंड के बावजूद अल्मोड़ा, लोहाघाट, चंपावत सहित आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग युगपुरुष स्वामी विवेकानंद के दर्शन और स्वागत के लिए एकत्रित हुए।
स्वामी विवेकानंद काठगोदाम तक रेल मार्ग से पहुंचे और वहां से मोरनौला, देवीधुरा होते हुए पैदल यात्रा कर अद्वैत आश्रम, मायावती पहुंचे। आश्रम के निकट पहुंचते ही वे हिमालयी सौंदर्य से इतने अभिभूत हो गए कि कुछ क्षण वहीं ठहरकर प्रकृति को निहारते रहे। उन्होंने अनुभव किया कि स्विट्जरलैंड की अल्प्स में जिस प्रकार के आश्रम की उन्होंने कल्पना की थी, उसका सजीव स्वरूप उनके सामने मायावती में उपस्थित है। लंबी और कठिन यात्रा के बाद भी आश्रम को देखकर उनकी समस्त थकान क्षण भर में दूर हो गई।
इस ऐतिहासिक यात्रा में स्वामी विवेकानंद के साथ उनके प्रमुख शिष्य गोविंद लाल शाह, बद्रीलाल शाह, स्वामी विरजानंद, स्वामी शिवानंद, स्वामी सदानंद सहित अनेक श्रद्धालु और अनुयायी भी उपस्थित थे। स्वामी विवेकानंद का मानना था कि हिमालय उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा का मूल स्रोत है, जहां से उन्हें निरंतर नई प्रेरणा और शक्ति प्राप्त होती है। इसी भावभूमि पर उन्होंने देवभूमि उत्तराखंड में आश्रम स्थापना की कल्पना साझा की थी।
उल्लेखनीय है कि स्वामी विवेकानंद के आगमन से पूर्व स्वामी स्वरूपानंद जी ने मार्च 1899 में अद्वैत आश्रम की स्थापना कर दी थी। स्वामी विवेकानंद ने इस आश्रम को मानव जीवन के उत्थान, आत्मबोध और अद्वैत वेदांत के व्यापक प्रचार का केंद्र बताया। उन्होंने कहा था कि यह आश्रम सभी दर्शनों के प्रति सहानुभूति रखते हुए भी अद्वैत के आदर्शों के लिए समर्पित रहेगा। स्वामी विवेकानंद के चरण पड़ते ही मायावती की यह पावन धरा आध्यात्मिक चेतना से आलोकित हो उठी। उन्होंने यहां एक पखवाड़े तक प्रवास किया और आश्रम की कार्ययोजना तथा भावी भूमिका पर विस्तृत चर्चा की। आज भी अद्वैत आश्रम मायावती स्वामी विवेकानंद की उस ऐतिहासिक यात्रा और विचारधारा का सजीव साक्ष्य बना हुआ है।





