
”रिश्तों की दुनिया में अनमोल उपहार है, प्रेम का यह रक्षाबंधन”
जीवन के हर मोड़ पर यूँ तो विभिन्न रिश्ते बनते हैं। हर रिश्ता अपनी जगह अनमोल होता है जिसे हम मानते हैं और जोड़कर रखने का प्रयास भी करते हैं। कभी आपसी द्वेष, मनमुटाव, गलतफहमी की वजह से कुछ टूट जाते हैं और कई ऐसे भी होते हैं जो अंत तक साथ रहते हैं, जो विषम परिस्थिति में भी दूर नहीं होते। यही तो है दुनिया जहाँ सब अपनी सोच-विचार और समझ के अनुसार एक दूसरे से जुड़कर रहते हैं। भाव जहाँ शुद्ध होते हैं वहीं रिश्ते टिकते हैं, जहाँ नफरत हो वहाँ एक पल भी काटना मुश्किल होता है। घर-परिवार में चहल-पहल, हँसी-ठिठोली और मुस्कुराहट का जरिया होते हैं भाई-बहन। दुनिया का सबसे प्यारा रिश्ता, जो बचपन में साथ खेलते-पलते और बढ़ते हैं। आपस में लड़ते-झगड़ते हैं लेकिन दूसरे ही पल फिर मिल जाते हैं। रूठने-मनाने का यह सिलसिला चलता ही रहता है। एक दूसरे के लिए बहुत परवाह होती है जिनके बिना रह नहीं सकते। यूँ तो पराई होती है बहना लेकिन जीवन भर दिल में रहती है एक दूसरे के। एक पल भी स्मृति से ओझल नहीं होते। चहकते-उछलते, कूदते कब बड़े हो जाते हैं पता ही नहीं चलता। स्वार्थ से ऊपर होता है इनका प्यार। जब बचपन की दहलीज लाँघकर बड़ी होकर ससुराल जाती है तो सबसे ज्यादा चिंता एक भाई को होती है, न जाने कैसे अलग दुनिया में सामंजस्य करेगी, इतने लाड़-प्यार में रहने वाली। फिर भी हर तीज-त्यौहार और खुशी के अवसर पर इंतजार करती है, कब मायके जाए और आ ही जाती है अपने परिवार का हाल-चाल जानने के लिए।
एक अजीब विडंबना है इस समाज की, कैसे एक परिवार में पली बेटी अपने ही परिवार से जुदा हो जाती है और पराई कहलाती है? जब वो विवाह के बाद मायके आती है तो अपने ही घर में पराई हो जाती है। खुलकर कहने से संकोच करती है, अपनी परेशानी बताने से डरती है। ज्यादा दिन रहने पर उसे चिंता रहती है। दो परिवारों के बीच उलझ जाती है। वैसे भी वो मायके की किसी चीज का बँटवारा नहीं माँगती, सब कुछ भाई के लिए छोड़ जाती है लेकिन बहुत ही तकलीफ होती है एक बहन को जब नए रिश्ते में बंधने के बाद जीवन साथी पाकर वे बहन को भूल जाते हैं, छोड़ देते हैं। कहती नहीं सिर्फ सहती है, घुटती है और बचपन में भाई के साथ गुजारी मधुर स्मृति को याद करती है कि कैसे भाई उनकी छोटी-छोटी खुशियों का ख्याल रखते थे, आज क्या हो गया? जब विशेष अवसर में भी उनको अपने ही घर में मान-सम्मान, प्यार और दुलार नहीं मिलता, भाई के परिवार बसने से घर की स्थिति बदल जाती है अधिकतर परिवारों में जो कि अनुचित है। चाहे जीवन का कोई भी मोड़ हो कभी भी बहन को पराएपन का एहसास न होने दें, यही भाई-बहन के रिश्तों की सार्थकता है, औपचारिकता न हो, प्रेम के मायने न बदलें। जो आपके लिए हर पल खुशियों की दुआ माँगती है उन्हें आपसे अपनापन भी न मिले तो धिक्कार है। आज समय बदला है, बेटे-बेटी में कोई फर्क नहीं, माता-पिता की संपत्ति में दोनों का बराबर अधिकार है, वे चाहें तो अपना अधिकार पूरा बराबर ले सकती हैं लेकिन हर युग में नारीशक्ति अपने त्याग और तपस्या का परिचय देती है, कभी माँगती नहीं, अपना हिस्सा खुद छोड़ देती है, इससे अधिक और क्या चाहिए? रिश्तों की दुनिया एक अनोखा उपहार है जहाँ हम रहते हैं, सुख-दुःख को सहते हैं और तकलीफ में साथ खड़े होते हैं, भटकने पर राह दिखाते हैं, भले ही राह अलग हो जाती है लेकिन हृदय में वे स्थापित होते हैं। दिल से जुड़े रिश्ते नाजुक होते हैं लेकिन प्रेम की एक बूँद पड़ने से ही मजबूत बन जाते हैं, जो जीवन के हर सफर में साथ रहते हैं, उनके एहसास, करुणा, दया, ममता और आशीर्वाद से एक नई राह मिलती है, निराश नहीं होते, अपनेपन में एक उत्साह होती है जिनके होने से ही जीने की हर पल एक नई वजह मिलती है। रिश्तों के इस महासागर में हर इंसान डुबकी लगाता है और अपने जीवन को धन्य बनाता है, जहाँ मर्यादा, संयम, साहस, शौर्य, सम्मान के गुण सीखते हैं। कई रिश्ते होते हैं, माता-पिता एक कड़ी होते हैं जो सभी को जोड़कर रखते हैं, घर के बड़े बुजुर्ग उसके संरक्षक होते हैं, अच्छी-बुरी बातों का ज्ञान कराते हैं। घर के हर सदस्य आपस में एक दूसरे के रक्षा कवच होते हैं। पहले परिवार को प्राथमिकता देना, जहाँ रहते हैं उनके खुश होने पर ही हम अन्य रिश्तों को निभा पाने की क्षमता विकसित कर पाते हैं। किसी को चोट पहुँचने पर मरहम बन जाते हैं, यही तो है लगाव जो कभी छूटता नहीं, चाहे कितने भी दर्द मिलें और बढ़ता ही है।
भाई-बहन के अटूट बंधन का पर्व रक्षाबंधन है। एक डोर में जीवन के सार छुपे होते हैं, सिर्फ नाम के लिए नहीं होते। कोई भी त्यौहार, भारतीय संस्कृति में हर पर्व का पौराणिक और धार्मिक महत्व है, फिर भाई-बहन का रिश्ता तो पवित्रता की असीम पराकाष्ठा का संदेश देता है। हर भाई को समझना होगा कि किसी भी हालत में बहन की आँख में एक बूँद आँसू न आए, आपके किसी व्यवहार से दिल न दुखे, हर मोड़ पर उनका ध्यान रखें, उनकी सुरक्षा के लिए तैयार रहें। रक्षाबंधन एक संकल्प का पर्व है, सिर्फ खून के रिश्ते का ही नहीं, दुनिया के हर कोने में किसी की बहन बेबस, लाचार न हो। जहाँ भी कोई अकेली बेटी, बहन, माँ, बहू मुसीबत में दिखे उनकी सहायता के लिए आगे आएँ। अगर हर भाई पवित्रता के इस पर्व को समझे तो एक ही बात महत्वपूर्ण है, कसम कभी टूटे नहीं। एक कसम लें कि किसी की बेटी को बुरी नजर से न देखें, उन पर टीका-टिप्पणी न करें, छेड़खानी करने वाले वहशी दरिंदों को कड़ी सजा दिलवाएँ। ऐसी व्यवस्था और उपाय ढूँढें कि हर जगह बहन सुरक्षित रहे, हर बहन में अपनी बहन की छवि देखें। हर गली-मोहल्ले, चौक-चौराहे, सड़क, सूनी राह में एक युवाओं का संगठन बने जहाँ किसी भी बेटी से गलत होने पर तुरंत उनकी सुरक्षा हो सके। तभी रक्षाबंधन का यह पर्व सही मायने में भाई के प्रति प्रेम का अटूट बंधन हो पाएगा और भारत की बेटी हर जगह शान से सफलता का परचम लहरा पाएगी। हर बहन भाई का आदर करे, उनकी सही बातों का अनुकरण करे, किसी के बहकावे में आकर गलत कदम न उठाने का संकल्प रक्षाबंधन में अपने भाई को अवश्य दे। बहला-फुसलाकर बहन की पवित्रता को भंग करने वाले हर रावण का विनाश करने के लिए हर भाई को अब राम के गुणों को अपनाना ही चाहिए ताकि कोई सीता लक्ष्मण रेखा न लाँघे। भारतीय संस्कृति की विशेषता है वसुधैव कुटुम्बकम्, इस दृष्टि से पूरा संसार ही एक परिवार है, एक सुरक्षा का कवच बन जाए। जागरूक और सतर्क हो भाई तो कोई बहन बीच सड़क, सूनी राह, जंगल-झाड़ी में लहूलुहान नहीं होगी और हर बहन सोच-समझकर ही घर की दहलीज लाँघे। हर पग पर खड़े हैं जाहिल दरिंदे, पहचान करना मुश्किल है। दामन न छोड़े परिवार का, भाई-बहन का प्यार सदैव से पवित्र है और रहेगा, यूँ ही एक बंधन में रहे, कभी किसी का साथ न छूटे, रक्षाबंधन यही संदेश लेकर आया है। कोई बहन साक्षी न बने और श्रद्धा की तरह किसी दरिंदे के प्यार में अंधी न हो, भाइयों पर विश्वास रखें, उनका साथ दें।
सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री, लेखिका व अध्यापिका
रिपोर्टर, उद्घोषिका, नवापारा-राजिम,
रायपुर, (छत्तीसगढ़)





