
प्रत्येक दिन की तरह आज भी स्कूल में आवाज़ गूंज रही थी – मैडम आ गईं, मैडम आ गईं! सभी बच्चों ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, गुड मॉर्निंग मैडम। प्रार्थना सभा हुई। बच्चे अपनी-अपनी कक्षा में चले गए। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी।
कक्षा की छत टपक रही थी। टप… टप… टप…बच्चे बेंच खिसकाकर एक सूखे कोने में सिमट गए। किताबें भीग न जाएं, इसलिए सीने से लगा ली थीं।
फिर वही बचपन शुरू हो गया। कोई कह रहा था – कल हमारे आंगन में पानी भर गया था। कोई कह रहा था – मैंने कागज की नाव बनाकर तैराई। पूरी कक्षा हल्ला-गुल्ला और किस्सों से भरी थी, उस टपकती छत के नीचे भी वे बहुत खुश थे। तभी प्रधान पाठक आए। तेज आवाज में बोले – कोई ऊँची आवाज में बात नहीं करेगा! सब शांत हो जाओ!
एक पल में सन्नाटा छा गया। बच्चों ने डरकर किताबें खोल लीं। पढ़ने के लिए एकदम तैयार। तभी पीछे से एक छोटे बच्चे ने धीरे से कहा – गुरु जी, ऊपर से रेत गिर रही है… छोटा पत्थर भी…शिक्षक झल्ला गए, चिल्लाकर बोले – चुप रहो! तुम लोगों का रोज का नाटक है। पढ़ना-लिखना है या नहीं? बच्चा सहम गया और चुप हो गया।
क्लास फिर शांत थी। सिर्फ़ बारिश की आवाज और छत के टपकने की आवाज। और फिर… एक जोर की धमक हुई। धम! एक ऐसी आवाज, जिसके बाद…कक्षा में हमेशा के लिए खामोशी छा गई। वे आवाजें, जो कभी मैडम आ गईं! कहकर गूंजती थीं, अब कभी सुनाई नहीं देंगी।


ममता साहू
लेखिका, कवयित्री व शिक्षिका
कांकेर (छत्तीसगढ़)






