
हिन्दुस्तान की गौरव गान है हिन्दी, सरगम की सुंदर साज है हिन्दी।’
हमें इस बात की अत्यंत प्रसन्नता है कि हम हिंदी की सेवा में अपना अमूल्य योगदान दे रहे हैं। हम हिंदी के प्रति सदैव ही अपना प्रेम बनाए रखेंगे। यदि सभी की सोच हिंदी के विकास और उसके प्रति सम्मान बढ़ाने वाली हो जाए, तो यह बहुत ही खुशी की बात होगी। हमारा निरंतर प्रयास यही है कि हम हिंदी को उसका उचित सम्मान दिलाएं
हिन्दी, हृदय की तार को झंकृत करती है।
ब्रह्मांड के ज्ञान का भंडार है हिन्दी,
भटकती रूह की केंद्र बिंदु है हिन्दी।
सहज-सरल और सार्थक होती हिन्दी,
हिन्दुस्तान की आन-बान-शान है हिन्दी।
मन की गहराई में विचारों की बहती अविरल धारा है, जो समय-परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग रूप में आती रहती है। इन विचारों को एकत्रित करने से मस्तिष्क उत्तेजित होने लगता है, जिन्हें समय-समय पर खाली करना पड़ता है। जिसे व्यक्त करने के लिए माध्यम की आवश्यकता पड़ती है, जिसे सहज हम कह रहे हैं, समझ सकें। भारतीय संस्कृति में विविधता में भी एकता के दर्शन होते हैं, जहाँ अलग-अलग बोली-भाषा, जाति-मजहब के लोग रहते हुए भी अपनी सभ्यता को अंतस में सहेजे हुए हैं। हृदयगत भावों की अभिव्यक्ति भाषा ही होती है। बिना भाषा के विचारों का सम्प्रेषण संभव नहीं। भाषा जोड़ती है आत्मा को एक सूत्र में। चंचल मन को पिरो लेती है एक माला में वही। भाषा श्रेष्ठ होती है जो आत्मा को स्पर्श करती है, जिसे हम निःसंकोच व्यक्त कर सकें। एक ऐसी भाषा जिसमें अपनी मिट्टी की सोंधी सी महक हो, बचपन में हम जिस भाषा को सुनकर पले-बढ़े, खेले-कूदे हैं, बड़े होने पर भी हम उसी भाषा को समझते हैं। जिसमें अपनत्व का भाव होता है, जिसे कहते हैं – मातृभाषा। जिस स्थान पर हम रहते हैं उस स्थान की भाषा-बोली हमें सहज ही अपनी ओर आकर्षित करती है, जिसमें मिठास होती है जो मधुर लगती है, जिसे हम सुनना और उसी भाषा में बात करना चाहते हैं।
सभी लोगों को अपनी भाषा और बोली से स्नेह होता है। एक स्थान विशेष के लोग अपनी भाषा को अधिक महत्व देते हैं। तमिल, उड़िया, बंगाली, मराठी, गुजराती कई भाषाएँ हैं जिसे हम सुनते हैं और सोचते हैं, पर कह नहीं सकते। सभी अपने क्षेत्र की भाषा-बोली में बात कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं। वैसे ही हम हिंद की भूमि में रहते हैं, हिंदी ही हमारे विचारों की जननी है। हिंदी हिन्दुस्तान की आवाज है, तो हमें अपनी मातृभाषा हिन्दी का सम्मान करना और करवाना अवश्य चाहिए, जिसके प्रचार-प्रसार में योगदान देना चाहिए। हिंदी हमारे अस्तित्व की परिचायक है। हिन्दी में सहज रूप से हम अपनी हर बात व्यक्त कर सकते हैं।
आज पाश्चात्य सभ्यता हम पर हावी है। हम पूरी तरह उसमें डूबकर देश की आन-बान और शान, हिन्दुस्तान की पहचान हिन्दी की अवहेलना करते हैं। अंग्रेजी पहनावा, बोलचाल, रहन-सहन शैली को अपना रहे हैं और सदियों से चली आ रही परंपरा को धूमिल करते जा रहे हैं। रोजगार और कैरियर बनाने के चक्कर में अंग्रेजी पढ़ना व समझना अनिवार्य समझते हैं। पढ़े-लिखे अधिकतर अभिभावक बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में ही शिक्षा देना चाहते हैं। उनकी सोच है समय की मांग है – अंग्रेजी, जिसमें रोजगार के अधिक अवसर हैं। इस कारण अपनी जमीं को छोड़कर वे विदेशों में पढ़ने जाते हैं। विदेशी संस्कृति को अपनाकर उसी में रच-बस जाते हैं लेकिन ध्यान दिया जाए तो हिन्दी का विस्तार आज तेजी से हो रहा है। हिन्दी में भविष्य उज्ज्वल है, कहीं भी पीछे नहीं है। हिंदी मीडियम में पढ़ाई कर आज के युवा बड़े-बड़े पदों पर आसीन हुए हैं। किसी भी भाषा को सीखना गलत बात नहीं, पर उसका अंधानुकरण करना बिल्कुल गलत है। अंग्रेजी सीखना अलग बात है, हर भाषा का ज्ञान रखना चाहिए, पर अपनी मातृभाषा से प्रेम और स्नेह गर्व की बात है। अंग्रेजी समय की मांग नहीं, हमारी सोच की ही उपज है। हमारी मानसिकता ही वैसी बन गई है, अपनी भाषा का तिरस्कार हम स्वयं कर रहे हैं और अंग्रेजी का भूत सवार कर आज की पीढ़ी को महान संस्कृति से दूर कर अंग्रेज बनाने पर तुले हैं।
हिंदी विशाल सागर है, जिसमें कई छोटी-बड़ी नदियाँ आकर समाहित हो जाती हैं। हिंदी सूर्य का तेज प्रकाश है जो सर्वत्र व्याप्त है, जिसकी महत्ता को बताने की जरूरत नहीं है। सृजन का श्रेष्ठ माध्यम है, बड़े-बड़े साहित्यकार हुए जो हिंदी में सृजन कर भारत के प्राचीन इतिहास का बखान किए। ऋषि-मुनियों के सुंदर उद्गार, अध्यात्म की गंगा हिंदी भाषा ही है, जिसमें जीवन का सार है। हिंदी हमारी जननी समान है, जो एक स्रोत है लोगों को अपनी भाषा में बातों को समझाने का, हिंदी स्वाभिमान की भाषा है। देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी है। भारतीय संविधान ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया। आज हम सोशल मीडिया के युग में जी रहे हैं, जहाँ बड़े-बड़े मंच स्थापित हैं और हिंदी में हर कार्य बहुत तेजी से हो रहे हैं। आर्थिक-सामाजिक जानकारी हिन्दी में है, यह सुव्यवस्थित और संस्कारित भाषा है, जो राष्ट्रभाषा है, जिसे हर वर्ग के लोग आसानी से समझ सकते हैं, जो राष्ट्र के प्रति प्रेम का द्योतक है। हिंदी हृदय की तार को झंकृत करती है, जो सुमधुर और प्रिय है, जिसके प्रति हर हिन्दुस्तानी को लगाव होना स्वाभाविक है। ‘हिन्दी दिवस’ पर अधिक संख्या में इसे अपने व्यवहार में लाने व आत्मीयता प्रकट करने के लिए और आने वाली पीढ़ी को इसके महत्व को बताने के लिए विभिन्न प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं – निबंध, गीत, कहानी, कविता, प्रेरक प्रसंग आदि। भारतीय होने के नाते हम सभी का परम् कर्तव्य है हिन्दी को जानें, समझें और दिल से स्वीकार करें।
सरगम की सुन्दर सी, साज है हिन्दी,
संस्कृति की परिचायक होती हिन्दी।
अंतस में शक्ति का संचार है हिन्दी,
मनोवृत्तियों की प्रचारक होती हिन्दी।


सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री, लेखिका, शिक्षिका
रिपोर्टर, उद्घोषिका, नवापारा-राजिम,
रायपुर (छत्तीसगढ़)







