
लोहाघाट। पिता दशरथ की भूमिका में और उनके दोनों बेटे राम-लक्ष्मण बनकर सामने खड़े हों—लोहाघाट की रामलीला के मंच ने ऐसे यादगार क्षण भी देखे हैं। हथरंगिया के हर्ष देव राय मासाब और उनके परिवार का समर्पण आज भी रामलीला की पुरानी पीढ़ी की स्मृतियों में बसा है।
हर्ष देव राय उस समय चंपावत में शिक्षक थे। रामलीला की तालीम और मंचन में भाग लेने के लिए वह रोज वहाँ से पैदल लोहाघाट आते थे। उनके पिता टीकाराम राय रावण का इतना प्रभावशाली अभिनय करते थे कि बच्चे डर जाते थे। हर्ष देव राय ने स्वयं लगभग 60 वर्षों तक रावण और दशरथ की भूमिकाएँ निभाईं।
राय परिवार की पीढ़ियों ने अभिनय और संगीत से सींची रामलीला की परंपरा
कई अवसरों पर उनके बड़े बेटे राजन राय राम और छोटे बेटे गिरीश लक्ष्मण की भूमिका में मंच पर उतरे, जबकि पिता ने दशरथ का किरदार निभाया। राजन राय ने छह वर्ष की आयु में शत्रुघ्न की भूमिका से शुरुआत की और बाद में अहिल्या का पात्र भी निभाया। चालीस वर्ष से अधिक समय तक राम की भूमिका निभाने के बाद वह पिछले करीब 20 वर्षों से हारमोनियम मास्टर के रूप में सहयोग कर रहे हैं।
खटीमा में शिक्षक गिरीश भी रामलीला के दिनों में लोहाघाट अवश्य आते हैं। पिछले लगभग ढाई दशक से वह अंगद की भूमिका निभा रहे हैं। राजन के अनुसार, अगली पीढ़ी का रामलीला के अभिनय की ओर रुझान भले कम हो, लेकिन संगीत में उसकी दिलचस्पी बनी हुई है।
हर्ष देव राय के जीजा, राय नगर-चौड़ी निवासी केशब दत्त राय और उनके पाँचों पुत्रों का अभिनय भी दर्शकों के लिए अविस्मरणीय रहा। तारा दत्त राय पुरुष और महिला, दोनों प्रकार के किरदारों को इतनी कुशलता से निभाते थे कि दर्शकों की आँखें भर आती थीं।
राजन राय कहते हैं कि परिवार की इस विरासत को आगे बढ़ाने की प्रेरणा उन्हें श्रीराम से मिलती है। उनके लिए रामलीला केवल मंचन नहीं, पीढ़ियों से चला आ रहा सेवा और समर्पण का भाव है।
फोटो कैप्शन: दुर्लभ चित्र में श्रीराम की भूमिका में राजन राय और लक्ष्मण के रूप में उनके छोटे भाई गिरीश।






