
डॉ0 ओ0पी0 मिश्र
लखनऊ। 2014 का वर्ष भारतीय राजनीति के लिए केवल सत्ता परिवर्तन का वर्ष नहीं था । यह भारतीय राजनीति के सामाजिक और वैचारिक समीकरणों में एक बड़े बदलाव का भी वर्ष था।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई और हिंदू, राष्ट्रवाद, सनातन तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में और अधिक मजबूती से देने दिखाई देने लगे। इस परिवर्तन में सवर्ण समाज की भूमिका महत्वपूर्ण रहीं। उसे लगा कि यह पहली सरकार बनी है जो उसके सपनों को पूरा करेगी चुनावी विश्लेषणों में भी यह बात साफ होती गई कि सवर्ण समाज का करीब 65 से 70% वोट कमल को मिला। लेकिन अचानक से 2024 में उत्तर प्रदेश में भाजपा का सामाजिक आधार कमजोर हुआ इसके बावजूद और यह जानते हुए भी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वास्तव में पिछड़ा वर्ग से आते हैं और पिछड़े वर्ग की ही राजनीति कर रहे हैं सवर्ण समाज ने भाजपा का साथ दिया और अगर ना दिया होता तो 20 सीटें भी भाजपा को उत्तर प्रदेश में ना मिलती।

अब सवाल दिया है कि क्या सवर्ण समाज ने जिस राजनीतिक व्यवस्था को अपना सबसे मजबूत समर्थन दिया उसी व्यवस्था में वह स्वयं राजनीतिक रूप से कमजोर होता गया। उसे शायद राजनीतिक टूल्स बनाकर रखा गया जो भाजपा के लिए झगड़ा करें गाली गलौज करें मारा जाए , पीटा जाए अपमानित किया जाए और हिंदुत्व के नाम पर सनातन के नाम पर उसको अछूत घोषित किया जाए। इसके बावजूद भाजपा उसका साथ ना दे। शायद इसीलिए की भाजपा के लिए वह साधन मात्र था, साध्य नहीं।
वैसे किसी राजनीतिक दल का समर्थन होना लोकतंत्र में अपराध नहीं लेकिन समर्थन होने का अर्थ यह भी नहीं कि वह सरकार से सवाल पूछना बंद कर दे । जहां तक मैं समझता हूं यदि आपके समाज के साथ अन्याय होता है तो आवाज उठाना जरूरी है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में से एक अजीब राजनीतिक मनो विजन दिखाई देता है। राजनीतिक समर्थन धीरे-धीरे राजनीतिक निष्ठा में और राजनीतिक निष्ठा कई बार अंध समर्थन में बदल जाती है और यही से समस्या शुरू होती है।
वैसे यह पूछना और कहना भाजपा को असहज कर सकता है कि क्या सवर्ण समाज आपका जर खरीद गुलाम है? या केवल आपके लिए वोट बैंक है या फिर वह सात खाने का रिन्च जिसे जब जहां चाहे इस्तेमाल कर दे । जिस समाज से चुनाव में समर्थन की उम्मीद की जाती है उसे क्या सरकार की नीतियों पर सवाल पूछने का अधिकार भी छीन लिया जाना चाहिए । चाहे रोजगार की समस्या हो, प्रतियोगी परीक्षाओं की समस्या हो, महंगी शिक्षा की समस्या हो, निजी क्षेत्र में अवसरों की कमी हो, छोटे व्यापार और स्वरोजगार पर दबाव हो, किसी युवा पर मुकदमा हो, किसी परिवार का सदस्य जेल चला जाए तो क्या इसलिए हम आवाज नहीं उठाएंगे, क्या इसलिए हम आंदोलन नहीं करेंगे कि सरकार हमारी अपनी है अपनी पसंद की है।
मैं मानता हूं कि सरकार अपनी हो सकती है लेकिन न्याय किसी पार्टी की संपत्ति नहीं हो सकती मैं यहां भक्त शब्द का इस्तेमाल किसी व्यक्ति का अपमान करने के लिए नहीं कर रहा हूं या उसे राजनीतिक मानसिकता का प्रतीक है जिसमें नता से सवाल करना निष्ठा के विरुद्ध समझ लिया जाता है। अब सवाल यह है कि क्या किसी नेता का समर्थन होना अपने विवेक को गिरवी रखने के बराबर है।
यदि कोई नेता आपके धर्म संस्कृति और राष्ट्रवाद की बात करता है तो यकीनन उसका समर्थन कीजिए लेकिन यदि वही नेता समाज में जहर फैलाने की बात करता है हिंदू मुस्लिम करता है श्मशान और कब्रिस्तान की ही बात करता है तथा प्रत्येक मस्जिद में शिवलिंग तलाशने को प्रोत्साहन करता है तो उसका विरोध कीजिए और जब वह नेता या पार्टी समाज के किसी व्यक्ति के साथ अन्याय के मामले में चुप हो जाए तब सवाल भी कीजिए। क्योंकि यही लोकतंत्र है और यही धर्मनिरपेक्षता है। क्योंकि लोकतंत्र में नेता जनता का प्रतिनिधि होता है मालिक नहीं। याद कीजिए 13 अक्टूबर 2024 को बहराइच में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान हुई हिंसा में रामगोपाल मिश्रा की मौत, उसके अंदर यह जहर किसने भरा, किसने उसे उकसाया कि वह किसी दूसरे धर्म के मानने वाले के घर में जाकर भगवा लहराए । किसने यह उसे यह ताकत दी और वह यह क्यों नहीं समझ पाया कि नेताओं की कथनी और करनी में फर्क होता है ।
इसलिए नहीं समझ पाया कि वह पार्टी का टूल्स था भक्त था अंधभक्त भी कह सकते हैं। यह मामला केवल एक हत्या का मामला नहीं था इस तरह की तमाम हत्याएं अब तक हो चुकी हैं । पत्रकारों की हो चुकी हैं । यह कानून व्यवस्था, सामुदायिक तनाव और राजनीतिक प्रतिक्रिया तीनों पर सवाल खड़ा करता है। एक युवा की जान चली गई उसके परिवार पर क्या बीती, अयोध्या आंदोलन के दौरान कोठारी बन्धुओं की जान चली गई उनके परिवार पर क्या बीती। ऐसे में मैं तो एक ही सवाल उछालूंगा कि क्या ऐसे मामलों में राजनीतिक नेतृत्व की प्रतिक्रिया उतनी ही मजबूत होती है जितनी चुनाव के समय उस समाज के समर्थन की उम्मीद होती है ।
मेरा फिर वही सवाल है कि यदि हिंदुत्व की राजनीति का समर्थन कोई व्यक्ति कानून कानूनी संकट में है तो उसके राजनीतिक और सामाजिक प्रतिनिधि कहां है? वे कहां है जिन्होंने उसे टूल्स बनाया। क्या ऐसे मामलों में कोई सवर्ण नेता सामने आता है क्या कोई बड़ा सामाजिक संगठन उसके साथ खड़ा होता है? देखना होगा कि कितने लोग और कितने लोग स्वतंत्र भारद्वाज के साथ खड़े होते हैं क्योंकि स्वतंत्र भारद्वाज का मामला उसके खेत खलियान और जायदाद का नहीं था बल्कि हिंदुत्व और सनातन का था । कहां गए सनातन और हिंदुत्व के अलमबरदार? अंत में सवाल केवल नेताओं से नहीं हम सवर्ण समाज को भी अपने आप से पूछना होगा कि-
हमने नेताओं को इतना बड़ा क्यों बना दिया कि उनसे सवाल पूछना हमें अपराध लगने लगे?
हमने अपनी राजनीतिक पहचान को अपने सामाजिक हितों के ऊपर क्यों रख दिया?
हमने अपने गांव कस्बो और मोहल्ले में हिंदू मुस्लिम करना क्यों शुरू किया?
हमने यह क्यों मान लिया कि जो हमारे धर्म की बात करता है वह हमारे प्रत्येक हित की रक्षा करेगा ?
हम यह कैसे भूल गए कि धर्म उसके लिए राजनीति का हथियार है आस्था नहीं?
हमें यह अभी मानना और समझना होगा की राजनीति भावनाओं से चल सकती है।
लेकिन समाज का भविष्य केवल भावनाओं से नहीं चल सकता। समाज के भविष्य के लिए रोजगार चाहिए, शिक्षा चाहिए, न्याय चाहिए , सुरक्षा चाहिए, सम्मान चाहिए और सबसे बढ़कर अपने प्रतिनिधियों से जवाब चाहिए। यह समय भक्त बनने का नहीं बल्कि नागरिक बनने का है। क्योंकि भक्त हमेशा आंखों में खटकता और कभी भी टारगेट पर आ सकता है। राजनीतिक दल के समर्थन तथा भक्त बनने से पहले नागरिक बने नेता के प्रशंसक बने रहिए लेकिन सवाल पूछने की ताकत हमेशा बनाए रखिए। सनातन के समर्थक बनिए लेकिन न्याय के प्रश्न पर मौन मत रहिए और ना ही किसी दूसरे धर्म के अनुयाई पर कटाक्ष कीजिए।
हिंदुत्व की बात कीजिए लेकिन मानवता को उससे नीचे मत रखिए। यदि कोई नेता आपके वोट का अधिकारी बनना चाहता है तो उससे पूछिए कि जब हमें आपकी जरूरत थी तब आप कहां थे। यही प्रश्न लोकतंत्र को जीवित रखेगी इसलिए समर्थन कीजिए लेकिन आंखें खोलकर। विश्वास कीजिए लेकिन सवाल पूछ कर । वोट दीजिए लेकिन रिपोर्ट कार्ड देखकर और यह सब करने तथा कहने से पहले किसी नेता के प्रति नहीं अपने विवेक के प्रति निष्ठावान रहिए।







