
दिल्ली। साहित्य हितकारी होता है। “हितेन् सहितम् इति साहित्यम्” यह साहित्य की मूल परिभाषा है और जो साहित्य हितकारी नहीं होता वो साहित्य हो ही नहीं सकता। साहित्य में हित वचन आवश्यक है, इसके साथ ही साथ साहित्य में सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय का भाव भी सन्निहित होता है। इस कारण यह राष्ट्रीयता की भावना को भी रेखांकित करता है। साहित्य केवल लिखने की कला नहीं है अपितु देश, काल परिस्थिति के अनुसार समय, समाज और मानवीय पीड़ा के प्रति पूर्णतः जिम्मेदार होता है।
साहित्य की रचना धर्मिता का अर्थ साहित्यकार के उस सृजनात्मक कौशल, सम्वेदनशीलता और दायित्व से है जिसके माध्यम से वह अपनी कल्पना और अपने अनुभवों को शब्दों में ढालता है। साहित्य समाज के यथार्थ, मानवीय संघर्ष और मूल्यों को गहराई से अभिव्यक्त करने की प्रतिबद्धता है। उक्त उद्गार अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए अलीगढ के गौरवशाली कवि एवं साहित्यकार डॉ.दिनेश कुमार शर्मा ने साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था ‘अंतस्’ (नई दिल्ली) के तत्वावधान में आयोजित 84वीं कवि संगोष्ठी (आभासी तरंग संगोष्ठी) में संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किये।
इस कवि संगोष्ठी की संयोजिका, *अंतस्* की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ . पूनम माटिया ने बहुत ही सफल एवं सरस संचालन किया। यह संगोष्ठी बहुत ही स्वानुशासित संगोष्ठी रही। मुख्य अतिथि रहीं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ निशा भार्गव।
इस संगोष्ठी का श्री गणेश *पूजा श्रीवास्तव* द्वारा बहुत ही सुंदर तरीके से निम्न पंक्तियों के साथ सरस्वती वंदना करते हुए प्रस्तुत किया गया
“माँ शारदे! हमें ज्ञान का संसार दे माँ,*
*मेरी लेखनी को अपनी कृपा से तार दे माँ।
सुशीला श्रीवास्तव* ने इस संगोष्ठी का प्रारंभ छलपूर्ण संसार और आंतरिक द्वंद्व के भावों से ओतप्रोत अपनी ग़ज़ल की निम्न पंक्तियों के साथ किया – “राहों में लाख ख़ौफ़ के साये लिये हुए, हम चल पड़े थे हौसलों के पर लिये हुए”*, जिसमें छलपूर्ण संसार और आंतरिक द्वंद्व के भाव थे।
इसके पश्चात् अपर्णा भटनागर ने विरह और अधूरेपन के भाव को दर्शाती हुई अपनी ग़ज़ल की निम्न पंक्तियों के साथ अपना काब्य पाठ किया – *“बिन तेरे ज़माना भी हमें अच्छा नहीं लगता”* जो भावनात्मक गहराई और शिल्प-कौशल के लिए सराही गई।
*अंतस्* की वरिष्ठ उपाध्यक्ष अंशु जैन ने विदेश में रह रहे बच्चों को संबोधित एक कविता प्रस्तुत की, जिसमें उन्हें सावन में घर लौटने का आग्रह किया गया; इसे बहुत सराहा गया।
पूजा श्रीवास्तव ने एक कजरी/भोजपुरी गीत – “कैसे जइ बहु खेलन के कजरिया”* प्रस्तुत किया, जो मानसून और प्रियजन की वापसी का उत्सव मनाता है; यह सत्र की पहली कजरी प्रस्तुति के रूप में उल्लेखनीय रही।
पूजा चौहान ‘रवि’ ने अपने काव्य पाठ में कहा “जोग पहना है मैंने तुम्हारे लिये, अश्रु नैनों में अपनी छुपा कर जिये/तुम तथागत बनो या बनो बुद्ध अब, हम खड़े राह में दीप बनकर प्रिये”।
डॉ. निशा भार्गव ने महिलाओं के जीवन पर एक हास्यपूर्ण किंतु गहन कविता, सावन के दोहरे स्वरूप (सौंदर्य और विनाश) पर रचना, तथा अपने 55वें जन्मदिन पर ख़ुद को छोटा दिखाने के हास्य-व्यंग्य से भरी एक रचना प्रस्तुत की।
*सोनम यादव* ने एक गीत – *“जीवन चाहे कठिन गरल हो, अमृत बरसाना क्यों छोड़े”* प्रस्तुत किया, जो जीवन की कठिनाइयों और सहनशीलता पर केंद्रित था; इसकी निःस्वार्थता की भावना के लिए सराहना मिली। *मोनिका शर्मा ‘मासूम’* ने नदी, आँखों और विरह के बिंब लिए एक ग़ज़ल – *“जांचा परखा देखा भाला आंखों ने/ रूप का दरिया खूब खंगाला आंखों ने”* प्रस्तुत की; इसे भरपूर सराहा गया।
*डॉ. नीलम वर्मा* ने सावन-विषयक दोहे, राधा-श्याम/वृंदावन पर एक रचना और मानसून पर एक प्रकृति-कविता सहित कई लघु रचनाएँ प्रस्तुत कीं; साथ ही पूनम माटिया के जन्मदिन पर बधाई स्वरूप अपनी बेटी की उम्र संबंधी तर्क-वितर्क वाला एक हास्य प्रसंग भी साझा किया – *“श्वेत पुष्प चंपा के घनघोर घटाओं का, अभिनंदन करते/ डाली पर झूला डाल, सावन की हवाओं में नर्तन करते”*। इनके साथ ही *अपर्णा गर्ग* ने अपने काव्य पाठ में कहा- *”आज फिर एक टुकड़ा शिला से दरक गया”*। इस काव्य पाठ को भी श्रोताओं ने बहुत सराहा।
पूनम माटिया ने सावन में वियोग श्रंगार का गीत पढ़ा और एक ग़ज़ल। *फाल्गुन बीता, बीत गया आषाढ़ कि आया सावन..*
संगोष्ठी के अध्यक्ष *डॉ. दिनेश कुमार शर्मा* ने मोबाइल फोन पर निर्भरता और आधुनिक जीवन के परंपरागत मूल्यों से दूर होने पर एक कविता प्रस्तुत की; साथ ही इस सभा और इसके प्रतिभागियों के सम्मान में अग्रलिखित पंक्तियाँ भी सुनाईं — *“भूल बैठ्यो वेद भी पुराण अब तौ तमाम, चमक-दमक में ही खोई निज शान है।/ मैय्या और बाबुल की सीख भी बिसारी सभी, समझ रह्यौ न निज देश कौ सम्मान”।*
*डॉ सरिता गर्ग* जी ने भी अपनी कविता प्रस्तुत की।
औसतन इस कवि संगोष्ठी मे आद्योपान्त मौज मस्ती का वातावरण छाया रहा। कवियों ने एक दूसरे के उत्साहवर्धन के लिए खूब तालियां बजाईं और उनका उत्साहवर्धन किया। कवि संगोष्ठी में , कँवल कोहली, इंजी. नरेश माटिया भी उपस्थित रहे। अंत में *अंतस्* के संरक्षक इंजी. नरेश माटिया ने सभी का आभार व्यक्त किया।







