
हमारा हिंदुस्तान, भारत की वह पावन, निर्मल और स्वच्छ मिट्टी है जो सदियों का गौरवगान लिए और अनगिनत बलिदानों की गाथाएं समेटे हुए है। यहाँ ‘मिट्टी पुकारे’ का वास्तविक अर्थ है—अपने बीत चुके कल के उन गौरवशाली देशभक्तों का स्मरण कराना, जिन्होंने मातृभूमि की अस्मत और मान-सम्मान के लिए हंसते-गाते अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे।
मिट्टी हमारे देश की साक्षी है उस बीते युग की… जब इसके मान-प्रतिष्ठा हेतु हिंदुस्तान में जन्मा प्रत्येक नागरिक सैनिक बन गया था। इस माटी की पुकार केवल पुरुषों तक सीमित नहीं थी, बल्कि भारत माता की वीर बेटियों ने भी पथ पर पग से पग मिलाया था। इस पग को मिलाकर उन्होंने क्रांति की मशाल को थामे रखा था। कवयित्री सरोजिनी नायडू जैसी वीरांगनाओं ने अपनी लेखनी और ओजस्विता से देश के रहने वाले वासियों के भीतर देशभक्ति की अलख जगा दी थी और विदेशी हुकूमत की नींव हिला दी थी। इस पावन मिट्टी से उपजी वह क्रांति की चिंगारी अंततः एक अखंड राष्ट्र के रूप में हमारे सामने लाकर रख दी गई थी… जिसकी खुली हवा में आज सब सांस ले रहे हैं। यह भारत की धरती अविरल और सर्वदा पूजनीय रही है… सदा रहेगी।
“हमारी भारत भूमि
सदैव देती ही है,
हमें हमेशा इसकी
वंदना करनी चाहिए।”
आज इसी स्वतंत्र भारत की हवा में सांस लेकर, यह हमारी हिंदुस्तानी भू हमसे एक नवीन संकल्प मांगती है। ‘मिट्टी पुकारे’ का आज के संदर्भ में यही अर्थ है कि हम अपनी समृद्ध संस्कृति, आपसी भाईचारे, सद्भावना और अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखेंगे। हमारे पूर्वजों ने जिस बगिया को अपने लहू से सींचा है, उसकी हरियाली को बचाए रखना और देश को उन्नति के शिखर पर ले जाना अब हमारे देश के प्रति प्रेम और आस्था से ही संभव है। इस निर्मल भूमि को कोटि-कोटि नमन करते हुए आइए, आज यह सौगंध खा लें कि हम इसके मान-सम्मान पर कभी आंच नहीं आने देंगे। देश हमारा है, प्यारा है और सबसे न्यारा है। छत्तीसगढ़ की इस पावन माटी ने कई ऐसे वीर सपूतों को जन्म दिया है, जिनका ऋण हम कभी नहीं भुला सकते।

कवयित्री, लेखिका एवं शिक्षिका
रिपोर्टर एवं उद्घोषिका
नवापारा-राजिम, रायपुर (छ.ग.)




