
आज 14 अगस्त का दिवस वही था… जिसे हम याद कर रहे हैं। जब उन्हें पता था कि आने वाला कल उगता हुआ सूरज लेकर निकलेगा। जब हिंदुस्तान की स्वतंत्रता की बलिवेदी पर प्राणों की आहुति दी जा रही थी, उस समय वीरों के सामने मात्र एक ही उद्देश्य रह गया था, वह था मातृभूमि को मुक्ति दिलाना। ‘आखिरी गोली तक’ के वास्तविक अर्थ को समझते हुए इसका अर्थ स्पष्ट है—उस अडिग संकल्प की पराकाष्ठा से, जहां मृत्यु सामने खड़ी हो तब भी पग कहाँ पीछे हटते थे! साक्षी है इतिहास कि हमारे क्रांतिकारियों और सैनिकों ने कभी संख्या बल अथवा हथियारों की कमी के आगे घुटने नहीं टेके, बल्कि अपनी आखिरी सांस और आखिरी गोली तक दुश्मन का सीना छलनी किया था… वही दिन है आज का। आज जब हम स्वाधीनता की वर्षगांठ मनाने की तैयारी करने में जुटे हुए हैं, तो यह भूमिका हमें स्मरण कराती है कि हमारी आज की खुली हवा उन वीर नायकों के इसी अंतिम समय तक किए गए संघर्ष की देन ही है।

“लगा दी थी जिन्होंने
अपनी जान की बाजी,
बंदूक ताने खड़े थे वो,
उस दिन भय का कोई
नाम न था उनके अंदर…
दुनियावालों! वीरों के इस
साहस को हमेशा याद रखना।”
‘आखिरी गोली तक’ लड़ने का यह हृदय का जज्बा सिर्फ इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं, वरन यह आज भी हमारे हिंदुस्तान के सुरक्षा बलों की रगों में दौड़ता प्रवहमान रक्त है। चाहे वह कारगिल की दुर्गम चोटियाँ हों या रेजांग ला का मैदान, भारतीय सेना ने हर एक बार यह सिद्ध करके दिखाया है कि जब बात राष्ट्र की अखंडता पर आती है, तो संसाधन नहीं, बल्कि भीतर का हौसला लड़ता है।
यह दिन हमें आत्मचिंतन करने और सोचने की उत्सुकता देता है कि जिस आज़ादी को बनाए रखने के लिए हमारे पुरखों ने अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया, उसकी गरिमा को हम अक्षुण्ण रखें। हमारे नायकों का वह सर्वोच्च बलिदान आज हमसे यह आह्वान करता है कि हम अपने-अपने क्षेत्र में पूरी ईमानदारी से कार्य करते हुए एक सशक्त, समृद्ध व सुरक्षित भारत का निर्माण करने का प्रयास बनाए रखें। यही उन अमर आत्माओं के प्रति हमारी वास्तविक व सहृदय कृतज्ञता होगी, जिसे हम अपने हृदय में बनाए रखेंगे… उन्हें स्मरण करेंगे।
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सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री, लेखिका एवं शिक्षिका
रिपोर्टर एवं उद्घोषिका
नवापारा-राजिम, रायपुर (छ.ग.)





