
(देशभक्ति विशेष कविता)
सैकड़ों साल की जंजीर थी,
अंग्रेजों का राज था।
भारत माँ के हाथों में बेड़ियां व ताज था।
टैक्स के नाम पर लूट थी व अंग्रेजों का कानून था।
दिन-रात की गुलामी, कहीं नहीं सुकून था।
फिर उठी एक चिंगारी, 1857 की ज्वाला थी।
रानी मंगल तात्या ने, गूंथी आज़ादी माला थी।
फांसी के फंदे चूमे, पर झुकी ना एक भी कली।
ख़ून देंगे जान देंगे गुंजा नारा गली-गली।
गांधी जी ने सत्य का हथियार दिया, भगत ने गोली खाई।
सुभाष ने जय हिंद कहा आजाद हिंद फौज बनाई।
लाठियां खाई जेल गए, आई कई बला।
करेंगे या मरेंगे हर दिल में, बस! यही चला।
और फिर वो सुबह आई, 15 अगस्त की रात।
लाल किले पर तिरंगा लहराया मिटी गुलामी की बात।
पर कीमत बहुत बड़ी थी, बंटवारे का दर्द मिला।
लाखों माताओं का आंचल ख़ून से सराबोर मिला।
आजाद हो गए पर क्या सच में आजाद हैं?
भ्रष्टाचार की बेड़ियां आज भी आबाद हैं।
जिस कुर्बानी से मिली आजादी उसको हम भूल गए।
देश के ख़ातिर वीर जवान सूली पर झूल गए।
नहीं अब और नहीं, वीरों का बलिदान व्यर्थ ना जाएगा।
हर बच्चा हर जवान देश के काम आएगा।
रिश्वत नहीं लेगा कोई सच का साथ निभाएगा।
ख़ुद को बदलेंगे पहले, फिर देश बदल जायेगा।
मेरे सपनों का भारत ऐसे ही तो मुस्कुराएगा!

कवयित्री ममता साहू
कांकेर, (छ.ग.)




