
आज पंद्रह अगस्त मास की यह भोर केवल एक तिथि नहीं मानेंगे इसे हम, बल्कि उन अनगिनत बलिदानों का जीवंत उत्सव मानते हैं, जिन्होंने हमें स्वतंत्र वायु में श्वास लेने का अधिकार दिया है। इस ऐतिहासिक दिवस पर, जब तिरंगा अम्बर को चूम रहा होता है, हमारे भीतर से जो आवाज़ उठती है, वही “वंदे की हुंकार” है। यह हुंकार है उन अमर बलिदानियों की अभिलाषाओं व स्वप्न की, मातृभूमि के प्रति अगाध सम्मान की तथा प्रत्येक हिंदुस्तानी सीने में सुलगती देशहित-भक्ति की अग्नि है। स्वतंत्रता के इस महान् पर्व पर हम सब मिलकर ‘वंदे’ के इस सिंहनाद को बुलंद कर लें तथा राष्ट्र निर्माण का एक नया संकल्प ले लें।
साक्षी है सिंहनाद की ! हमारा अतिप्रिय हिंदुस्तान न कभी झुका, न कभी रुका। हमेशा जीतता रहा…! ऐसे ही जीतता रहे। ‘वंदे’ की यह हुंकार हमारे रगों में बहते उस रक्त का प्रतीक है, जिसमें हमारे भारत की भक्ति का ज्वार उबल रहा है। आज जब सारा भव-संसार भारतवर्ष की मेधा, संस्कृति व सामर्थ्य का लोहा मान रहा है, तब हमारा दायित्व और बढ़ जाता है कि हम इस वैश्विक मंच पर तिरंगे की गौरव-शान को और ऊँचा पहुँचा दें। इसे केवल एक उत्सव न मानिए… बल्कि यह एक अग्नि-परीक्षा है, इस हिंदुस्तान को प्रत्येक क्षेत्र में शीर्ष पर पहुंचाने की। अपनी क़लम, अपनी आवाज़ व अपने कर्मों से इस हुंकार को दिशा हम देते हैं…
”हमारी भारत माता की ख़ुशबू,
हमारे श्वास में समाई रहती है।
एकता, सद्भाव, बंधुत्व की शक्ति!
हिंदुस्तान हमारा सदा ऊंचा ही रहेगा!”
उपरोक्त कविता के जो कुछ अंश प्रस्तुत किए हैं, ये पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि हर उस भारतीय के दिल की धड़कन हैं जो अपनी मातृभूमि से प्रेम करता है तथा उसकी पूजा करता है। ये पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि भारत माता की मिट्टी की महक हमारे अस्तित्व और प्राणों में रची-बसी है। जब तक हमारे भीतर एकता, आपसी सद्भाव और भाईचारे की अटूट शक्ति जीवित है, तब तक हिंदुस्तान का मस्तक हमेशा ऊंचा रहा और बना रहेगा…
अपनी पूरी निष्ठा, समर्पण, लगन एवं ललक के साथ माँ भारती के चरणों में यह संकल्प अर्पित करते हैं कि जब तक हमारे भीतर प्राणों का आवागमन है, हम इस भारत देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता पर आंच नहीं आने देंगे। यही एक वास्तविक स्वतंत्रता होती है और यही हमारा धर्म है, यही हमारी मानवता…। अतः स्वतंत्रता के इस काल में हम सिर्फ़ इतिहास के पृष्ठों को ही नहीं दोहरा रहे हैं… बल्कि स्वयं एक नव-इतिहास रचने के लिए तत्पर हो जाने की अभिलाषा जगाते हैं हृदय अतल में…।
हमारी राष्ट्रभक्ति केवल नारों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह हमारे दैनिक आचरण, हमारी ईमानदारी एवं हमारे सामाजिक सरोकारों में दिखाई देती आई है। जब समाज का एक-एक मनुज स्वयं के दायित्वों को न भूले… और उनका निर्वहन पूरी निष्ठा से करेगा, तभी ‘वंदे की यह हुंकार’ पूरी दुनिया में गूँज उठती है। माँ भारती के आँचल की छाँव में, देश के एक कोने से लेकर अंतिम छोर तक, हम सब मिलकर एक सुर में यह उद्घोष कर रहे हैं कि हमारा भारत अखंड था, अखंड है और सदैव अमर रहेगा। इसी अटूट आस्था तथा संकल्प के साथ, आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की सहृदय मंगलमय शुभकामनाएं देते हैं… एकता, सद्भावना बनी रहे यहाँ देश में।

सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका
रिपोर्टर/उद्घोषिका, नवापारा-राजिम,
रायपुर, (छत्तीसगढ़)





