
सुश्री सरोज कंसारी
प्रत्येक मनुष्य का जीवन जिम्मेदारियों से बंधा है, जहाँ प्रतिपल किसी न किसी बात की चिंता बनी रहती है। जब तक जीवन है, हम चिंताओं से मुक्त नहीं रह सकते। समस्याएँ आती और जाती हैं। खुद के बारे में सोचना और चिंताओं में डूबे रहना, केवल अपनी तकलीफ को महसूस करना, हर पल अपने दर्द को बताना यह सामान्य बात है। हर मनुष्य अपनी जगह रहकर जीवन का जंग लड़ रहे हैं। खुद के लिए हर सुख-सुविधा जुटाने की चाह, पद-प्रतिष्ठा, नौकरी प्राप्त कर लेना यह जरूरी है, निज सुख है। लेकिन अपने जीवन के कुछ पल जो सभी के लिए चिंतन करते हैं, उनका जीवन सच में महानता की श्रेणी में आता है। जो स्वार्थ से ऊपर होकर सभी के भले के लिए चिंतन करते हैं, उनका मानसिक मनोबल उच्च होता है। औरों के हित जो सोचते हैं, आगे बढ़कर सहयोग करते हैं, उनमें सकारात्मक भाव का संचार होता है। ‘मैं’ के भाव को छोड़कर जब हम सभी के लिए कार्य करते हैं, मिल-जुलकर समस्याओं के समाधान की सोचते हैं, तब एक संगठित परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में सहयोगी बनते हैं।
हर इंसान के पास अपनी अलग प्रतिभा है। जो अपनी हुनर, ज्ञान, समय और श्रम कुछ पल ही सही औरों के हित समर्पित करते हैं, वे बिखरे मानव को जोड़ने की एक कड़ी हैं। गलती किसी से भी हो सकती है, इसलिए क्षमाशील बनिए। किसी को बेवजह गलत बताकर मजा लेने की आदत से बचिए। वक्त का कोई भरोसा नहीं, आज जो चालाकी दूसरों से करोगे, वही आपके साथ भी दोहराया जाएगा। हर मनुष्य में आपसी सहानुभूति, करुणा, दया, सहयोग, अपनत्व और प्रेम की भावना होना जरूरी है। ज्यादा क्रोध, ईर्ष्या, बैर, नफरत, षड्यंत्र से खुद का जीवन जलता है, अंत में पश्चाताप के लिए सिर्फ राख बचती है, इसलिए सुधार करते रहिए। कुछ अच्छा करके जताने, बताने और दिखाने की जरूरत नहीं। आपके हर कर्म और व्यवहार में आपका व्यक्तित्व छलकता है।
हमेशा ईमानदारी से कार्य करने से मन में कोई संदेह नहीं होता, हम भयभीत नहीं होते। आत्म शांति के लिए हमें सच्चाई का साथ देना जरूरी है। भरोसा तोड़कर सदा के लिए हम किसी की नजर में गिर जाते हैं, इसलिए जो भी कहें, सोचकर कहिए और करके दिखाइए। झूठ बोलकर हम कुछ दिन बच सकते हैं, लेकिन सच का सामना एक दिन करना ही पड़ता है। खुद की नजर में शर्मिंदा होने से बचिए। आपके चरित्र का परिचय आपके द्वारा किए कर्म और व्यवहार से होता है।
हमें हर पल मानवीय भाव रख दुर्भाव का त्याग करते रहना चाहिए। खुद में अच्छाई को स्थापित करते रहने से बुराई खुद दूर होती है। खुद में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रयास जरूरी है। मानसिकता को बिखेरने के कई वजह होने के बावजूद, अपनी भावनाओं को सहज-सरल और मिलनसार रखकर जीवन में शांति-सुकून बनाए रखना भी हमारा धर्म है। किसी को दिखाने के लिए ही अच्छा करना, यह सोच आपकी दुर्बल मानसिकता का परिचय देती है।
सबके भले का चिंतन करने के लिए स्वार्थ से दूर होकर सोचिए! मैं ही दुखी हूँ, यह मत सोचते रहिए। सबके लिए शुभकामनाएँ कीजिए। हर किसी की मानसिक स्थिति को समझिए और जो सहयोग आप कर सकते हैं, उसे अवश्य कीजिए। चाहे आप कितने ही बुरे दौर से गुजर रहे हों, मन में किसी तरह का नकारात्मक विचार मत रखिए। जिससे दुआ मिले, उस कार्य को अवश्य कीजिए। दूसरों के दर्द को महसूस कीजिए और उन्हें दूर करने की कोशिश कीजिए। मन साफ रखिए। बुरे भाव से किए हर कार्य का परिणाम गलत ही होता है। अच्छी सोच ही हमें बुरी आदतों से दूर करती है। सेवा, सहयोग और प्रेम देने से अंतर्मन पवित्र होता है। किसी को खुशी देने से आत्मिक संतुष्टि मिलती है। बुराई से दूर रहने का सबसे सरल मार्ग अच्छे कार्य में लगे रहिए।
कविता:
”सब कुछ मंगलमय
बना रहता है,
यदि हम अपने स्वभाव
व विचारों को सुंदर, सरल
व सहज बनाकर रख लें।”
लगातार हम अपने मन को निर्मल रखते हैं और विचारों में अच्छाई और सरलता भर देते हैं, तब जीवन की हर कठिनाई भी आसान कर लेते हैं। सुंदर स्वभाव है हमारा, जहाँ भी जाते हैं, वहाँ शांति और प्रेम का वातावरण बन जाता है। किसी का भला करने के लिए हमें बस मन की शुद्धता और सहयोग की भावना चाहिए होती है। यदि हम ठान लें कि हमारे शब्दों, कर्मों और सोच से किसी को दुख न पहुँचे, तो इसी को सबसे बड़ी साधना मानकर चलें इस जीवन यात्रा में… इसी से घर, समाज और राष्ट्र सब मंगलमय बन जाते हैं।
सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका/रिपोर्टर/उद्घोषिका
नवापारा-राजिम, रायपुर, (छत्तीसगढ़)





